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Cancer Treatment | कैंसर के इलाज के दौरान शरीर पर दुष्प्रभाव खत्म करने के लिए कारगर साबित हो सकता है ‘IL-12′

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वाशिंगटन: कैंसर के कई प्रकार के उपचार शरीर पर प्रतिकूल असर डालते हैं। इलाज के लिए दी जाने वाली दवाएं स्वस्थ कोशिकाओं तथा ट्यूमर की कोशिकाओं दोनों पर हमला करती हैं जिससे कई प्रकार के दुष्प्रभाव होते हैं। प्रतिरक्षा तंत्र को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उनके प्रति हमलावर बनाने वाला ‘इम्यूनोथेरेपी’ उपचार भी इन दुष्प्रभावों से अछूता नहीं है। यद्यपि इस इलाज से बहुत से मरीजों का जीवन बचाने में सफलता मिली है, लेकिन यह कुछ ही मरीजों पर कारगर सिद्ध हुआ है।

एक अध्ययन में पाया गया कि स्तन कैंसर के 30 प्रतिशत से भी कम मरीजों को इम्यूनोथेरेपी से लाभ हुआ, परंतु, क्या ऐसा हो सकता है कि दवाओं में कुछ ऐसा बदलाव किया जाए कि वे केवल ट्यूमर कोशिकाओं पर ही हमला करें और शरीर के बाकी हिस्से को छोड़ दें?  इस पर शिकागो विश्वविद्यालय के प्रिट्जकर स्कूल ऑफ मॉलेक्युलर इंजीनियरिंग के मेरे सहकर्मियों और मैंने एक तरीका इजाद किया है, जिससे यह संभव हो सकता है। प्रतिरक्षा तंत्र, खतरे पर क्या प्रतिक्रिया देगा इसमें साइटोकाइन नामक प्रोटीन से बदलाव किया जा सकता है। 

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इसका एक तरीका है कि ‘टी’ कोशिकाओं को सक्रिय कर दिया जाए जो एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिकाएं होती हैं और कैंसर कोशिकाओं पर हमला कर सकती हैं। ट्यूमर को खत्म करने के लिए प्रतिरक्षा तंत्र को साइटोकाइन द्वारा प्रशिक्षित किया जा सकता है, इसलिए कैंसर के उपचार के लिए इनका महत्व बढ़ जाता है। ऐसा ही एक साइटोकाइन है, इंटरल्यूकीन-12 या आईएल-12 जिसकी खोज 30 साल पहले की गई थी। 

यह लिवर को क्षति पहुंचा सकता है और इसके अन्य गंभीर दुष्प्रभाव के चलते एफडीए (खाद्य एवं औषधि प्रशासन) ने अभी तक इसे कैंसर के इलाज के लिए मंजूरी नहीं दी है। वैज्ञानिक इस आईएल-12 को शरीर के लिए और सुरक्षित बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।  इसके सुरक्षित संस्करण को तैयार करने के लिए मेरे सहकर्मियों और मैंने स्वस्थ और कैंसरग्रस्त ऊतकों के बीच मुख्य अंतर का लाभ उठाया। कैंसर वाले ऊतकों में एंजाइम तेजी से बढ़ता है। कैंसर की कोशिकाएं तेजी से बढ़ती हैं, इसलिए वे ऐसे एंजाइम अधिक मात्रा में उत्पन्न करती हैं, जो उन्हें स्वस्थ ऊतक पर हमला करने और शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने में मदद करता है। 

इसकी तुलना में स्वस्थ कोशिकाएं बहुत धीमी गति से बढ़ती हैं और ऐसे एंजाइम कम पैदा करती हैं। हमने आईएल-12 पर ऐसा कवच लगाया है, जिससे उसका वह अणु ढक जाता है जो आमतौर पर प्रतिरक्षा कोशिकाओं को बांधकर उन्हें सक्रिय कर देता है। यह कवच तभी हटता है जब यह उन एंजाइम के संपर्क में आता है जो ट्यूमर के पास पाये जाते हैं। जब ये एंजाइम कवच को हटाते हैं तब आईएल-12 दोबारा सक्रिय हो जाता है और टी कोशिकाओं को तेजी से बढ़ाता है जो ट्यूमर पर हमला करते हैं। 

जब हमने मेलेनोमा और स्तन कैंसर के मरीजों द्वारा दान दिए गए स्वस्थ और ट्यूमर ऊतकों पर इन कवचधारी आईएल-12 अणुओं को छोड़ा तो नतीजों में इसकी पुष्टि हुई कि केवल ट्यूमर के नमूनों में ही कवच हटा बाकी में नहीं। इससे पता चला कि कवचधारी आईएल-12, ट्यूमर के इलाज में एक मजबूत प्रतिरक्षा तंत्र विकसित करने में सक्षम है। हमने पाया कि चूहों पर भी इसके प्रतिरक्षा संबंधी दुष्प्रभाव नदारद थे। स्तन कैंसर के मॉडल में हमारा कवचधारी आईएल-12 नब्बे प्रतिशत तक प्रभावी सिद्ध हुआ। इसके अलावा बड़ी आंत के कैंसर में यह सौ प्रतिशत कारगर साबित हुआ। (एजेंसी)

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